भोपाल में थोड़े दिनों पहले ही नॅशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा का समारोह ख़तम हुआ ,एक रतन थैय्यम के प्ले और लोकेन्द्र के सन्गीतप्रस्तुति को छोड़ दें, तो इतने बड़े समारोह में इतना खर्चा करके क्या मिला उन लोगों को, समझ नहीं आया । इतने सामान्य किस्म के परफोर्मेंस यदि करने हैं तो इनका नाम तो गया पानी में ।हमारे यहाँ अभिनय के नाम पर वोह भी ख़ास ड्रामा के अभिनय के लिए देश कि इतनी बड़ी संस्था के नाटक इतने निम्नस्तरीय हो जायेंगे किसी ने सोचा न था ।
भोपाल के लोकल ग्रुप या देश में स्वतंत्र रूप से कार्य कर रही रेपेर्तरी कहीं-कहीं बहुत अच्छा कार्य कर रही हैं । इन नाटको में तो बड़े-बड़े सेट, मंहगे साजो सामान के साथ बड़ा नाम ही मिला, दर्शन तो बहुत छोटे हो गए .वरना ७०.८०,९० के दशक के नाटक प्रदर्शन, दुनिया में नाटकों के उच्चतम
प्रदर्शनों तक पहुँच गए थे ।
और भारत में चाहे सनेमा हो या नाटक य फिर कोई और पर ज़्यादातर महान अभिनेता यहीं के रहे हैं , किन्तु इस बार बहुत निराशा हुई, । क्योंकि बाहर हो रहे बदलाव का असर मंच पर भी दिखा । वो सही था या गलत,ये तो विचारणीय है , पर नाटक की आत्मा मरती सी लगी ,जैसे मंच पर माइक का उपयोग,अत्यधिक ध्वनि विस्तारक बाजे,। पता नहीं क्यों नाटक जैसे खेले जाने वाले जिंदा माध्यम मेंये सब अच्छा नहीं लगा .वोह करंट नहीं पैदा हुआ जिसकी आशा थी ।
खैर सब कुछ बदल रहा है तो ये भी बदल ले ,किन्तु यदि ये ज्यादा हुआ तो जैसे हिंगलिश हो गई न हमारी हिंदी वैसे ही नाटक ,नाटक न होकर "फिल्माटक" हो जायेगा । और अब के ज्यादातर अभिनेता तो वहां जाते ही इसलिए हैं कि , फिल्मो में काम मिले ।
हम सब रंगकर्मियों में से कुछ ने भारत भवन में बिक रहीं किताबें खरीदीं, कुछ ने थैले ,कुछ ने कपडे जिन पर एन एस डी लिखा था । येही यादगार है समारोह के नाम पर शायद ..अच्छा होता यदि समारोह की जगह प्रतियोगिता आयोजित की होती तो एक दुसरे से अच्छा करने की होड़ में कुछ अच्छा तो कर जाते ॥ (अभी तो केवल बड़े नाम का पूर्वाग्रह ही देखने मिला )
खैर आस है फिर कोई नए "हबीब" नए "कारंत" ज़रूर आएंगे , और वे सभी नाम जो हिन्दुस्तानी रंगमंच का निर्माण करते रहे ।
(अपनी राय से हमें अवगत ज़रूर करवाएं )
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