Thursday, January 21, 2010

भोपाल में N.S D. फेस्टिवल "एहसास" फिल्माटक का

भोपाल में थोड़े दिनों पहले ही नॅशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा का समारोह ख़तम हुआ ,एक रतन थैय्यम के प्ले और लोकेन्द्र के सन्गीतप्रस्तुति को छोड़ दें, तो इतने बड़े समारोह में इतना खर्चा करके क्या मिला उन लोगों को, समझ नहीं आया । इतने सामान्य किस्म के परफोर्मेंस यदि करने हैं तो इनका नाम तो गया पानी में ।हमारे यहाँ अभिनय के नाम पर वोह भी ख़ास ड्रामा के अभिनय के लिए देश कि इतनी बड़ी संस्था के नाटक इतने निम्नस्तरीय हो जायेंगे किसी ने सोचा न था ।

भोपाल के लोकल ग्रुप या देश में स्वतंत्र रूप से कार्य कर रही रेपेर्तरी कहीं-कहीं बहुत अच्छा कार्य कर रही हैं । इन नाटको में तो बड़े-बड़े सेट, मंहगे साजो सामान के साथ बड़ा नाम ही मिला, दर्शन तो बहुत छोटे हो गए .वरना ७०.८०,९० के दशक के नाटक प्रदर्शन, दुनिया में नाटकों के उच्चतम
प्रदर्शनों तक पहुँच गए थे ।
और भारत में चाहे सनेमा हो या नाटक य फिर कोई और पर ज़्यादातर महान अभिनेता यहीं के रहे हैं , किन्तु इस बार बहुत निराशा हुई, । क्योंकि बाहर हो रहे बदलाव का असर मंच पर भी दिखा । वो सही था या गलत,ये तो विचारणीय है , पर नाटक की आत्मा मरती सी लगी ,जैसे मंच पर माइक का उपयोग,अत्यधिक ध्वनि विस्तारक बाजे,। पता नहीं क्यों नाटक जैसे खेले जाने वाले जिंदा माध्यम मेंये सब अच्छा नहीं लगा .वोह करंट नहीं पैदा हुआ जिसकी आशा थी ।

खैर सब कुछ बदल रहा है तो ये भी बदल ले ,किन्तु यदि ये ज्यादा हुआ तो जैसे हिंगलिश हो गई न हमारी हिंदी वैसे ही नाटक ,नाटक न होकर "फिल्माटक" हो जायेगा । और अब के ज्यादातर अभिनेता तो वहां जाते ही इसलिए हैं कि , फिल्मो में काम मिले ।

हम सब रंगकर्मियों में से कुछ ने भारत भवन में बिक रहीं किताबें खरीदीं, कुछ ने थैले ,कुछ ने कपडे जिन पर एन एस डी लिखा था । येही यादगार है समारोह के नाम पर शायद ..अच्छा होता यदि समारोह की जगह प्रतियोगिता आयोजित की होती तो एक दुसरे से अच्छा करने की होड़ में कुछ अच्छा तो कर जाते ॥ (अभी तो केवल बड़े नाम का पूर्वाग्रह ही देखने मिला )

खैर आस है फिर कोई नए "हबीब" नए "कारंत" ज़रूर आएंगे , और वे सभी नाम जो हिन्दुस्तानी रंगमंच का निर्माण करते रहे ।

(अपनी राय से हमें अवगत ज़रूर करवाएं )

Tuesday, January 19, 2010

अजय कुमार जी, घुघूती बासूती ,पटिये ,एवं जनोक्ति आपका बहुत बहुत आभार ,आगे भी अपने नैनो को मेरी

पंक्तियों से मिलन करवाते हुए अपना अनुग्रह बनाये रखियेगा ।,----: विवेक
आज बस इतना ही..........

कडकती धूप मे कुछ छांह मुझे दे जाये
ना ऐसा पेड़ कोई जिंदगी मे बो पाया

मेरे खुदा तू अब तौ मुल्क को तरक्की दे
खून बच्चों का और न हो जाया

हो गयी देर अब ' विवेक ' को घर जाने दो
घर है सूना ना आ जाये कोई गम का साया
------------विवेक मचान

Friday, January 8, 2010

आनंद खुद को खो देने का

कुछ बहुत अच्छे शेर याद आ रहे हैं , वसीम बरेलवी साहेब मेरे बहुत पसंदीदा शायर रहे हैं ,उन्ही के हैं।

सबनेमिलाये हाथ यहाँ तीरगी के साथ ,

कितना बड़ा मज़ाक हुआ रौशनी के साथ ।

किस काम की रही ये दिखावे की ज़िन्दगी,

वादे किये किसी से गुजारी किसी के साथ ।

कहने का मतलब ये कि अपन सब के साथ भी ऐसा ही हुआ। होता है कि, हम चाहते कुछ हैं ,हो जाता कुछ और, करना होता है कुछ, और हो जाता है कुछ और ही। आदमी को दिन में कई चरित्र निभाने होते हैं। बेटा,नौकरी पेशा,बाप ,भाई,देशभक्त,कलाकार,लेखक, धार्मिक ,नास्तिक, पता नहीं और कितने चेहरे आदमी जीता है। कहीं मजबूरी आ जाती है, कहीं रोटी पानी,कहीं फ़र्ज़,कहीं क़र्ज़,और फिर कहीं भगवान भी है और कहीं शैतान भी । कुछ काम हम आदमियों के, ये दोनों भी कर देते हैं, या होने नहीं देते ,कहते हैं न जैसी भगवान की मर्जी । ऐसा भी नहीं कि पूरे जीवन भगवान कि मर्जी चले, के कम से कम हम पर आरोप तो न लगें ,पर सहूलियत के अनुसार आदमी अपने बहाने (खुश होने शांत होने या दुखी होने के) गढ़ह लेता है ।

किन्तु दुःख सुख के परे भी कई रस हैं जीवन के । जैसे ढूँढने का रस, कोई चीज़ आप बड़ी शिद्दत से खोज रहे हों और वो मिले न पर मिलने कि उम्मीद जगी रहे । या कि अपने चरित्र को भूल जाने का रस ,जैसा हम किसी अनजान जगह पर पाते हैं । जहाँ आपको कोई नहीं जानता । ऐसे शहर मैं ही तो आपको आनंद मिलता है कहीं भी बैठ गए,कुछ भी खा लिया ।
तो ये जो अपने को खोने का आनंद है न, इसका कोई जवाब नहीं।

सब परेशानी अपने होने ही कि तो है ,आपको ज्यादातर शिकवे गिले उन्ही लोगों से होते हैं जो आपको जानते हैं ,अगर आप अपने को भूल जाएँ ,तो वो सब भी उसी के साथ ख़तम हो जायेगा । दुःख क्लेश सब खत्म ,एक नया आदमी ।
नहीं मैं अद्ध्यात्मिक नहीं हो रहा ,पर ये भी तो रस है।

जब से हम ज्यादा समझने लगे हैं ,तभी से तनाव आया है जीवन मैं,। ग्लोबल वार्मिंग हो रही है,नए नए कीटाणु आ रहे हैं, कहीं क्लोन बना रहे ,कहीं कुछ। पर इंसान तो वहीँ है ? मरा हुआ, कुचला हुआ । अरे भाई चौपालों को ख़त्म कर दो ,पर हम तो इन्टरनेट को मोहल्ला बना लेंगे ।
लेकिन आह तो है,क्यूंकि सामने बैठकर चार अनजान लोगों के साथ,गपियाना, चाय बीडी करना (मैं भले बीडी नहीं पीता फिर भी )। इससे ज्यादा मोक्षप्रद जीवन मैं क्या है भला ?

पर आप शांती से रहने कहाँ देते हो खुद को ,कभी,पडोसी का वो लड़का बनते हो जो ५० हज़ार का वेतन पा गया,कभी बुद्धिजीवी जो सब जानता है,कभी ताक़तवर देशभक्त जो अभी पकिस्तान को धुल छठा दे, कभी उम्र से कम का जवान, कभी बीवी का वफादार पति,कभी साहेब ,कभी अपनी जाती का समर्पित ,कभी अनुशासित मनुष्य।
पर भैया ज़रा ये भी तो देखो कि जीवन केवल उनका नहीं जो (तथाकथित ) ऊँचाई हासिल कर सके ,एक सामान्य आदमी बनकर जीना भी बड़ा है बल्कि ज्यादा मुश्किल ।
पर अपने को खो देने का जो आनंद है। वो भी कहाँ मिलता है । जो सरोकार हैं न आदमी के, वो बड़े ज़ालिम हैं। असल मैं माया वो ही है ।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखना ,बोलना,ग़रीबों की हिमायत के वचन,बाल मजदूरी पर आंसू ,दुखियों की बातें करके उन पर अफ़सोस प्रगट करना ,ये खुद को बड़ा बनाने कि चालें हैं ,।
हम खुद तो ये करते हैं पर दुसरे के करने पर चिलुगते हैं (इस शब्द का अर्थ है चिड़ना ) मतलब हिप्पोक्रेसी का बाप हैं हम। जब बच्चों को अनाथालय जा के मदद करने या कुछ सार्थक काम करने की बारी आती है तो एन जी ओ को कोसते हैं कि पैसे खा जायेगा.
तो भैय्या इस सब को छोडो ना ,हम तो कहेंगे कि भूलने का रस लो, खुद को भूलने का, फिर देखो । जीवन कि सार्थकता, निरर्थकता का रोना छोड़ कर बिना काम के पडोसी के यहाँ जाकर धुप सेंको ,या फिर नयी बनी गरम सब्जी का एक कटोरा उन्हें चखने दे कर आओ .बस यही शुरुआत है ..

एक गाना याद आरहा है ..."हो कितनी भी लम्बी रात दिया बन जलते जाना रे इस रह पे राही चलते जाना रे.......


अगली बार कुछ और रसों पर चर्चा करेंगे ...वैसे हमारा नाम विवेक है