Sunday, December 27, 2009
मैं अपने आप मैं गुम हूँ तमाम सदियों से
तुम्हारे ख़ाब की खातिर कभी जलूँगा फिर
मेरे दुश्मन तू मेरी पत्त्ती पत्त्ती खाक कर देना
अगर कुछ रह गया दरख्त बन लडूंगा फिर
की माँ के चाक सीने मैं अभी कुछ खाब बाकि हैं
अभी वो पूरे कर लूँ मैं कभी जियूँगा फिर
ऐ मेरे ज़ख्म तू हरा ही रहे तो भलाई है
ज़रा हिस्साब तो होले तुझे सियुन्गा फिर
अगर सौ बार भी इस मादरे वतन ने जान मांगी
यहीं सौ बार जन्म लूँगा और मरूँगा फिर - लेखक विवेक "मचान"
तुम्हारे ख़ाब की खातिर कभी जलूँगा फिर
मेरे दुश्मन तू मेरी पत्त्ती पत्त्ती खाक कर देना
अगर कुछ रह गया दरख्त बन लडूंगा फिर
की माँ के चाक सीने मैं अभी कुछ खाब बाकि हैं
अभी वो पूरे कर लूँ मैं कभी जियूँगा फिर
ऐ मेरे ज़ख्म तू हरा ही रहे तो भलाई है
ज़रा हिस्साब तो होले तुझे सियुन्गा फिर
अगर सौ बार भी इस मादरे वतन ने जान मांगी
यहीं सौ बार जन्म लूँगा और मरूँगा फिर - लेखक विवेक "मचान"
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